Friday, 19 May 2017

ग़ज़ल 

अपने  होठों  से , पिलाऊँगा  तुझे !
इश्के -ज़ाम  में , मिलाऊँगा  तुझे !

ज़िंदगी राह -राही  और सफ़र भी, 
डगर  पे चलना , सिखाऊँगा तुझे !

गुचों  से पूछ वे , क्या मांग रहे हैं  ?
हर वक्त,हर घड़ी,हँसाऊँगा  तुझे !

इन   अँधेरों  से  डर सा लगता है,
चाँदनी  रात  में,  बुलाऊँगा  तुझे !

आई  हैं  अब ,मिलन की घड़ियाँ ,
आ  जाना,छत पे सुलाऊँगा तुझे !
                   ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '

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