ग़ज़ल
बारबार मैं खुद को समझाता हूँ ,
बीच रास्ते से ही लौट आता हूँ।
मैं तो शीशे की तरह फूट गया,
पत्थर को गले से लगाता हूँ।
लहूलुहान हो गया मेरा जिस्म ,
अपने को भीतर से सहलाता हूँ।
मद्देनज़र हैं ये सारे अफ़साने ,
महफ़िल में ताज़ा शेर सुनाता हूँ।
गनीमत है,अभी तक बिखरा नहीं,
नगमे पुराने ही, मैं गाता हूँ।
हस्ती अपनी बुलबुले की तरह है,
जानता हूँ ,फिर भी भूल जाता हूँ।
आँसुओं से बेहिसाब इश्क है,
'कान्त ' को भी मैं , रुलाता हूँ।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
बारबार मैं खुद को समझाता हूँ ,
बीच रास्ते से ही लौट आता हूँ।
मैं तो शीशे की तरह फूट गया,
पत्थर को गले से लगाता हूँ।
लहूलुहान हो गया मेरा जिस्म ,
अपने को भीतर से सहलाता हूँ।
मद्देनज़र हैं ये सारे अफ़साने ,
महफ़िल में ताज़ा शेर सुनाता हूँ।
गनीमत है,अभी तक बिखरा नहीं,
नगमे पुराने ही, मैं गाता हूँ।
हस्ती अपनी बुलबुले की तरह है,
जानता हूँ ,फिर भी भूल जाता हूँ।
आँसुओं से बेहिसाब इश्क है,
'कान्त ' को भी मैं , रुलाता हूँ।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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