ग़ज़ल
ज़िंदगी जब भी तेरी आगोश में लाती है हमें ,
वो हसीं वादियाँ ढूँढने चली आती हैं हमें !
खिलते फ़ूलों सीं महकती हैं ये निगाहें ,
शाम ढ़लते ही तेरी आहट सताती है हमें !
प्यार तेरा कभी शबनम तो कभी बूँदा -बाँदी ,
ये महकते बदन की ख़ुश्बू भाती है हमें !
गुंचों से जरा देखो कि हम क्या मांग रहे हैं ,
आपके हंसने की अदा पास लाती है हमें !
हर मुहब्बत का अंज़ाम ऐसा क्यों होता है ?
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें !
***
-'कान्त '
ज़िंदगी जब भी तेरी आगोश में लाती है हमें ,
वो हसीं वादियाँ ढूँढने चली आती हैं हमें !
खिलते फ़ूलों सीं महकती हैं ये निगाहें ,
शाम ढ़लते ही तेरी आहट सताती है हमें !
प्यार तेरा कभी शबनम तो कभी बूँदा -बाँदी ,
ये महकते बदन की ख़ुश्बू भाती है हमें !
गुंचों से जरा देखो कि हम क्या मांग रहे हैं ,
आपके हंसने की अदा पास लाती है हमें !
हर मुहब्बत का अंज़ाम ऐसा क्यों होता है ?
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें !
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-'कान्त '
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