Thursday, 14 May 2015

गीत 
सपनों में ही भोर हो गई,
नींद थी मीठी चूर हो गई !

एक हाथ से बजी थी ताली,
मैं भोला, या भ्रम था खाली !

सुंदर आशाओंकी लाली,
बिखरी और धूल हो गई !

किसके घर लगाई न फेरी,
मन की गठरी कहाँ न हेरी !

अपनों की पहचान में ,
मेरी भूल हो गई !

ख़ून पसीने से सींची बगिया,
तब मेहनत से चटकी कलियाँ !

फूलोंकी डाली भी भैया ,
शूल हो गई !

साँझ चला बनजारा ऐसे,
रात लिखी तक़दीर में जैसे !

अब सूरज से नाता तोडूँ कैसे,
किरणें चकचूर हो गईं !
                ***
-'कान्त'


No comments:

Post a Comment