गीत
सपनों में ही भोर हो गई,
नींद थी मीठी चूर हो गई !
एक हाथ से बजी थी ताली,
मैं भोला, या भ्रम था खाली !
सुंदर आशाओंकी लाली,
बिखरी और धूल हो गई !
किसके घर लगाई न फेरी,
मन की गठरी कहाँ न हेरी !
अपनों की पहचान में ,
मेरी भूल हो गई !
ख़ून पसीने से सींची बगिया,
तब मेहनत से चटकी कलियाँ !
फूलोंकी डाली भी भैया ,
शूल हो गई !
साँझ चला बनजारा ऐसे,
रात लिखी तक़दीर में जैसे !
अब सूरज से नाता तोडूँ कैसे,
किरणें चकचूर हो गईं !
***
-'कान्त'
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