ग़ज़ल
मुस्कराने की वजह तुम हो,
इजहार करने की जगह तुम हो !
जब भी चाँद तुमको देखता है ,
मेरा और उसका कलह तुम हो !
सहने को अब और क्या बचा है,
दिले-नादाँ का विरह तुम हो !
गनीमत है कि हालात अच्छे हैं ,
मेरी संपत्ति की गिरह तुम हो !
हमनवाओंमें रंजिशें आ जाती हैं ,
उन्हें मिलाने की सुलह तुम हो !
***
-'कांत '
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