Saturday, 16 May 2015

ग़ज़ल 

मुस्कराने  की  वजह   तुम   हो,
इजहार करने की जगह तुम हो !

जब  भी चाँद  तुमको देखता  है ,
मेरा  और उसका कलह तुम  हो !

सहने को अब और क्या  बचा है,
दिले-नादाँ   का  विरह  तुम  हो !

गनीमत है कि हालात अच्छे  हैं ,
मेरी  संपत्ति  की गिरह तुम हो !

हमनवाओंमें रंजिशें आ जाती हैं ,
उन्हें   मिलाने की सुलह तुम हो !
                   ***
-'कांत '







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