Tuesday, 12 May 2015

ग़ज़ल 

कभी  हमें  भी  दिल से  लगाया करो,
थोड़ी  चाह  हम पर भी  लुटाया  करो !

खिली    हो   ऐसी   खूबसूरत  चाँदनी , 
आपकी   छत पे हमें भी बुलाया करो !

बंदिशे-अल्फ़ाज़  हैं  आपकी गज़लमें ,
अंजुमन  में अंदाज़  से सुनाया  करो !

कोई  भला  आप से   क्या-क्या  माँगे ,
माजरा  जो  भी  हो हमें बताया करो !

हम तो  बंद  हैं  कब के  कैदेह्यातमें ,
दबे पाँव कभी तो  मिलने आया करो !

यूँ  तो  हमें  नींद नहीं आएगी उम्रभर,
कमसे कम ख्वाब में तो सताया करो !

या रब 'कांत' परेशान है  तगाफूल से,
आप    बातों -बातों  में   जताया करो !
                    ***
-'कान्त '












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