ग़ज़ल
कभी हमें भी दिल से लगाया करो,
थोड़ी चाह हम पर भी लुटाया करो !
खिली हो ऐसी खूबसूरत चाँदनी ,
आपकी छत पे हमें भी बुलाया करो !
बंदिशे-अल्फ़ाज़ हैं आपकी गज़लमें ,
अंजुमन में अंदाज़ से सुनाया करो !
कोई भला आप से क्या-क्या माँगे ,
माजरा जो भी हो हमें बताया करो !
हम तो बंद हैं कब के कैदेह्यातमें ,
दबे पाँव कभी तो मिलने आया करो !
यूँ तो हमें नींद नहीं आएगी उम्रभर,
कमसे कम ख्वाब में तो सताया करो !
या रब 'कांत' परेशान है तगाफूल से,
आप बातों -बातों में जताया करो !
***
-'कान्त '
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