गीत
इन टूटी -फूटी खपरैलों से,
देखो चाँदनी बिखर रही है।
होले -होले दिल की उदासी,
चारों ओर सिमट रही है।
घर का आँगन सूना होगा
सूने होंगे सारे गलियारे,
कहाँ कहाँ ढूँढूगा अब मैं ,
खुशियों के युक्त उजियारे ?
यही सोचकर शायद फिर,
रात खुद से लिपट रही है।
ये आसमान,बसति सितारों की
हरी-भरी ये मस्त वादियाँ ,
उठती हैं गोदी में लेकर ,
धवल पुंज बहारों की।
इनकी सांसों से आती खुश्बू ,
मेरे तन-मन में उतर रही है।
सोच रहा, उन्हें आगोश में भर लूँ ,
समा जाऊँ अखिल ब्रह्माण्ड में.
मैं भी आसमान का सितारा बनकर,
अपने आप से अपने को हर लूँ.
पर ये सब मुझे अकेला छोड़कर,
दबे पाँव घर से निकल रही हैं।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त'
इन टूटी -फूटी खपरैलों से,
देखो चाँदनी बिखर रही है।
होले -होले दिल की उदासी,
चारों ओर सिमट रही है।
घर का आँगन सूना होगा
सूने होंगे सारे गलियारे,
कहाँ कहाँ ढूँढूगा अब मैं ,
खुशियों के युक्त उजियारे ?
यही सोचकर शायद फिर,
रात खुद से लिपट रही है।
ये आसमान,बसति सितारों की
हरी-भरी ये मस्त वादियाँ ,
उठती हैं गोदी में लेकर ,
धवल पुंज बहारों की।
इनकी सांसों से आती खुश्बू ,
मेरे तन-मन में उतर रही है।
सोच रहा, उन्हें आगोश में भर लूँ ,
समा जाऊँ अखिल ब्रह्माण्ड में.
मैं भी आसमान का सितारा बनकर,
अपने आप से अपने को हर लूँ.
पर ये सब मुझे अकेला छोड़कर,
दबे पाँव घर से निकल रही हैं।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त'
No comments:
Post a Comment