Wednesday, 26 April 2017

ग़ज़ल 

लगागा ,    लगागा ,   लगागा ,   लगागा 

न   कोई   सहारा   न  कोई  ठिकाना,
मिलेगा  कहाँ    से  नशेमन  सुहाना।

असीरों   तलक   जो,   परिंदे  उड़े  हैं , 
उन्हें  तो  अभी  है, जमीं  पे  बुलाना।

किया  है   बसेरा , सबा  में  सदा  में ,
लगा  था   सताने , ज़माना  सयाना। 

नशा   तो  चढ़ा  है,  हमारी  रज़ा  से,
पड़ेगा  हमें  भी , खुदी  को पिलाना। 

कहे  जा  रहे  हैं , बज़म  में  फ़साने,
अजीजां   सुनाओ,  नया  ही तराना।  

हमीं  ने  कहा  था, मिटा दो  किनारे,
कभी  भी  मिलेगा,गनीमत  पुराना। 
                      ***
--कृष्णकांत भाटिया  'कान्त '







No comments:

Post a Comment