ग़ज़ल
लगागा , लगागा , लगागा , लगागा
न कोई सहारा न कोई ठिकाना,
मिलेगा कहाँ से नशेमन सुहाना।
असीरों तलक जो, परिंदे उड़े हैं ,
उन्हें तो अभी है, जमीं पे बुलाना।
किया है बसेरा , सबा में सदा में ,
लगा था सताने , ज़माना सयाना।
नशा तो चढ़ा है, हमारी रज़ा से,
पड़ेगा हमें भी , खुदी को पिलाना।
कहे जा रहे हैं , बज़म में फ़साने,
अजीजां सुनाओ, नया ही तराना।
हमीं ने कहा था, मिटा दो किनारे,
कभी भी मिलेगा,गनीमत पुराना।
***
--कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
लगागा , लगागा , लगागा , लगागा
न कोई सहारा न कोई ठिकाना,
मिलेगा कहाँ से नशेमन सुहाना।
असीरों तलक जो, परिंदे उड़े हैं ,
उन्हें तो अभी है, जमीं पे बुलाना।
किया है बसेरा , सबा में सदा में ,
लगा था सताने , ज़माना सयाना।
नशा तो चढ़ा है, हमारी रज़ा से,
पड़ेगा हमें भी , खुदी को पिलाना।
कहे जा रहे हैं , बज़म में फ़साने,
अजीजां सुनाओ, नया ही तराना।
हमीं ने कहा था, मिटा दो किनारे,
कभी भी मिलेगा,गनीमत पुराना।
***
--कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
No comments:
Post a Comment