Friday, 14 April 2017

ग़ज़ल 

दर्द    को   दिल    का  मेहमान  किया  है  मैंने,
अपने    आप   पर    एहसान   किया    है  मैंने। 

तुम   नफ़रतें    जितनी    चाहो    बाँटा   करो,
प्यार  को   ही   निगाहबान    किया    है  मैंने। 

कोई   इस  मचलती   हवा से   इतना  कह दो,
कई  बार   उस   का   सम्मान  किया  है  मैंने। 

इस  दौर  में , दिलावर  लोग   कहाँ   मिलते हैं ?
सिरहाज पर आँसुओं को,कुरबान किया है मैंने। 

ज़ख्म  लगते हैं  जेहन  पर, टीस सी उठती  है,
तलखिये -अईयाम को,मुस्कान किया है मैंने। 

कभी हम तूफ़ान  का  रुख मोड़ दिया करते  थे,
'कान्त ' ज़ुल्मी ताकतों को हैरान किया है मैंने। 
                             ***
-कृष्णकांत भाटिया ' कान्त'



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