Saturday, 22 April 2017

ग़ज़ल 

आज़  वो  बे-नक़ाब  आ जाता,
कोई  हसीन, ख़्वाब  आ जाता। 

हम तो  खूबसूरती पर हैं फ़िदा,
कुदरत का , शबाब  आ  जाता। 

क़तरा -क़तरा बह रहीं हैं आँखें ,
आँसुओं  में सैलाब  आ  जाता। 

तेरे ज़िस्म की खुश्बू है अल्हड़,
छत  पर , महताब  आ  जाता। 

हमें  इंतज़ार  है , लयला  तेरा,
'कांत ',तेरा रु आब आ  जाता। 
                 ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '

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