ग़ज़ल
आज़ वो बे-नक़ाब आ जाता,
कोई हसीन, ख़्वाब आ जाता।
हम तो खूबसूरती पर हैं फ़िदा,
कुदरत का , शबाब आ जाता।
क़तरा -क़तरा बह रहीं हैं आँखें ,
आँसुओं में सैलाब आ जाता।
तेरे ज़िस्म की खुश्बू है अल्हड़,
छत पर , महताब आ जाता।
हमें इंतज़ार है , लयला तेरा,
'कांत ',तेरा रु आब आ जाता।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
आज़ वो बे-नक़ाब आ जाता,
कोई हसीन, ख़्वाब आ जाता।
हम तो खूबसूरती पर हैं फ़िदा,
कुदरत का , शबाब आ जाता।
क़तरा -क़तरा बह रहीं हैं आँखें ,
आँसुओं में सैलाब आ जाता।
तेरे ज़िस्म की खुश्बू है अल्हड़,
छत पर , महताब आ जाता।
हमें इंतज़ार है , लयला तेरा,
'कांत ',तेरा रु आब आ जाता।
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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