ग़ज़ल
वे कहते हैं कि तुम्हारा यहाँ क्या काम है ?
ये बस्ती तो कई सालों से बड़ी बदनाम है ।
जब दिन ढ़लता है तो यहाँ रात सजती है,
पायल की झंकार अपने आप से गुमनाम है।
हर एक चेहरे के पीछे चौखटा है उदासी का,
मुन्नी बेगम की साँसों के भी यहाँ दाम हैं ।
प्यास लगती है तो यहाँ पानी नहीं मिलता,
सब के हाथों में बस शराब के ही जाम हैं।
आँसु बहुत से हैं सारंगी-तबले की आँखों में,
ठुमरी भी यहाँ कभी कभी लगती बे-जान है।
***
-'कान्त '
वे कहते हैं कि तुम्हारा यहाँ क्या काम है ?
ये बस्ती तो कई सालों से बड़ी बदनाम है ।
जब दिन ढ़लता है तो यहाँ रात सजती है,
पायल की झंकार अपने आप से गुमनाम है।
हर एक चेहरे के पीछे चौखटा है उदासी का,
मुन्नी बेगम की साँसों के भी यहाँ दाम हैं ।
प्यास लगती है तो यहाँ पानी नहीं मिलता,
सब के हाथों में बस शराब के ही जाम हैं।
आँसु बहुत से हैं सारंगी-तबले की आँखों में,
ठुमरी भी यहाँ कभी कभी लगती बे-जान है।
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-'कान्त '
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