ग़ज़ल
अपनी तनहाइयों को सजा के बैठा हुँ ,
चाँद-सितारों को गले लगा के बैठा हुँ।
हमारा तो सब कुछ लुट गया सफर में ,
कोहसार से बादलों को भगा के बैठा हुँ।
इशरत है दर्द से युँ लिपट कर जीना,
गुजरते लम्हों को जगा के बैठा हुँ।
यहाँ कोई भी सच को सच नहीं कहता,
सत्यमेव जयते की धुन बजा के बैठा हुँ।
पिंजरा खुला है आज बहुत दिनों के बाद,
चुलबुली चिड़िया को उड़ा के बैठा हुँ।
पथ्थरों की साँसें भी आज चल रही हैं ,
अपना दामन जहान से बचा के बैठा हुँ।
***
-'कान्त '
अपनी तनहाइयों को सजा के बैठा हुँ ,
चाँद-सितारों को गले लगा के बैठा हुँ।
हमारा तो सब कुछ लुट गया सफर में ,
कोहसार से बादलों को भगा के बैठा हुँ।
इशरत है दर्द से युँ लिपट कर जीना,
गुजरते लम्हों को जगा के बैठा हुँ।
यहाँ कोई भी सच को सच नहीं कहता,
सत्यमेव जयते की धुन बजा के बैठा हुँ।
पिंजरा खुला है आज बहुत दिनों के बाद,
चुलबुली चिड़िया को उड़ा के बैठा हुँ।
पथ्थरों की साँसें भी आज चल रही हैं ,
अपना दामन जहान से बचा के बैठा हुँ।
***
-'कान्त '
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