ग़ज़ल
आप ने तो राज़ की बात कह दी,
बहिरे को साज की बात कह दी।
ख़ुशी से फ़ासला था एक कदम,
मुमताज को ताज की बात कह दी।
गुनगुना रहे थे अपने बचपन को,
गाते गाते नाज़ की बात कह दी।
हलकारा आया था घर सवेरे-सवेरे,
लिखापड़ी ने आज की बात कह दी।
भाग जाने का सोच ही लिया था,
ड्यौढ़ी ने लाज की बात कह दी।
***
-'कान्त '
आप ने तो राज़ की बात कह दी,
बहिरे को साज की बात कह दी।
ख़ुशी से फ़ासला था एक कदम,
मुमताज को ताज की बात कह दी।
गुनगुना रहे थे अपने बचपन को,
गाते गाते नाज़ की बात कह दी।
हलकारा आया था घर सवेरे-सवेरे,
लिखापड़ी ने आज की बात कह दी।
भाग जाने का सोच ही लिया था,
ड्यौढ़ी ने लाज की बात कह दी।
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-'कान्त '
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