Wednesday, 1 June 2016

ग़ज़ल 

ख़ुद  को  पढ़ता  हुँ और  जोड़ देता  हुँ ,
सुख  के लम्हे,तेरी ओर मोड़  देता हुँ। 

तोताचश्म  होना  अच्छा नहीं लगता,
तौर-तरीक़े   के   बाँध   तोड़  देता  हुँ। 

तिलमिलाना  छोड़  दिया  है कब  से ,
सारी रंजिशें  सरलता से छोड़ देता हुँ। 

यकायक  यादें    सताने   लगती   हैं ,
अनजान  रास्ते  पर   दौड़   देता   हुँ। 

नासूर  बन जाता है  जब कोई ज़ख्म ,
फोड़े  को  मैं    हाथों  से  फोड़ देता हुँ। 
                      ***
-'कान्त'




No comments:

Post a Comment