ग़ज़ल
ख़ुद को पढ़ता हुँ और जोड़ देता हुँ ,
सुख के लम्हे,तेरी ओर मोड़ देता हुँ।
तोताचश्म होना अच्छा नहीं लगता,
तौर-तरीक़े के बाँध तोड़ देता हुँ।
तिलमिलाना छोड़ दिया है कब से ,
सारी रंजिशें सरलता से छोड़ देता हुँ।
यकायक यादें सताने लगती हैं ,
अनजान रास्ते पर दौड़ देता हुँ।
नासूर बन जाता है जब कोई ज़ख्म ,
फोड़े को मैं हाथों से फोड़ देता हुँ।
***
-'कान्त'
ख़ुद को पढ़ता हुँ और जोड़ देता हुँ ,
सुख के लम्हे,तेरी ओर मोड़ देता हुँ।
तोताचश्म होना अच्छा नहीं लगता,
तौर-तरीक़े के बाँध तोड़ देता हुँ।
तिलमिलाना छोड़ दिया है कब से ,
सारी रंजिशें सरलता से छोड़ देता हुँ।
यकायक यादें सताने लगती हैं ,
अनजान रास्ते पर दौड़ देता हुँ।
नासूर बन जाता है जब कोई ज़ख्म ,
फोड़े को मैं हाथों से फोड़ देता हुँ।
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-'कान्त'
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