ग़ज़ल
तेरे सवाल का कोई जवाब नहीं है,
मयख़ाने में हर चीज़ ,शराब नहीं है।
चुमकारना रोते हुए किसी बच्चे को,
इससे बढ़ा कोई शबाब नहीं है।
दरहक़ीक़त ये है इस ज़िंदगी की,
ये सिर्फ़ आँसुओं का सैलाब नहीं है।
दिखता है जो द्रश्य खुली आँखों से,
वो हकीकत है ;कोई ख़्वाब नहीं है।
साँसों का ये खेल सब खेलते हैं ,
शतरंज में हर मोहरा नवाब नहीं है।
***
-'कान्त'
तेरे सवाल का कोई जवाब नहीं है,
मयख़ाने में हर चीज़ ,शराब नहीं है।
चुमकारना रोते हुए किसी बच्चे को,
इससे बढ़ा कोई शबाब नहीं है।
दरहक़ीक़त ये है इस ज़िंदगी की,
ये सिर्फ़ आँसुओं का सैलाब नहीं है।
दिखता है जो द्रश्य खुली आँखों से,
वो हकीकत है ;कोई ख़्वाब नहीं है।
साँसों का ये खेल सब खेलते हैं ,
शतरंज में हर मोहरा नवाब नहीं है।
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-'कान्त'
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