Saturday, 4 June 2016

ग़ज़ल 

ढुलकना  कभी-कभी  अच्छा  लगता  है ,
तक़ाज़ा  ज़िंदगी का   सच्चा  लगता  है। 

तफ़सील  नहीं   कर  शकती  मेरी  जुबाँ ,
तेरा ये   दीवानापन   कच्चा  लगता   है।  

बिहान का  भी  सोच ,पल  में  जीनेवाले,
कई बार तू    बे-लगाम  बच्चा लगता है।  

रात   में   नींद   ताबड़तोब आ  जाती  है, 
सबेरे-सबेरे  सपना  ज़च्चा    लगता   है। 

तिकड़म तेरा  कुछ  काम  नहीं  आयेगा ,
यहाँ    जिसे  देखो , वो  लुच्चा लगता है। 
                          ***
-'कान्त'


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