ग़ज़ल
ढुलकना कभी-कभी अच्छा लगता है ,
तक़ाज़ा ज़िंदगी का सच्चा लगता है।
तफ़सील नहीं कर शकती मेरी जुबाँ ,
तेरा ये दीवानापन कच्चा लगता है।
बिहान का भी सोच ,पल में जीनेवाले,
कई बार तू बे-लगाम बच्चा लगता है।
रात में नींद ताबड़तोब आ जाती है,
सबेरे-सबेरे सपना ज़च्चा लगता है।
तिकड़म तेरा कुछ काम नहीं आयेगा ,
यहाँ जिसे देखो , वो लुच्चा लगता है।
***
-'कान्त'
ढुलकना कभी-कभी अच्छा लगता है ,
तक़ाज़ा ज़िंदगी का सच्चा लगता है।
तफ़सील नहीं कर शकती मेरी जुबाँ ,
तेरा ये दीवानापन कच्चा लगता है।
बिहान का भी सोच ,पल में जीनेवाले,
कई बार तू बे-लगाम बच्चा लगता है।
रात में नींद ताबड़तोब आ जाती है,
सबेरे-सबेरे सपना ज़च्चा लगता है।
तिकड़म तेरा कुछ काम नहीं आयेगा ,
यहाँ जिसे देखो , वो लुच्चा लगता है।
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-'कान्त'
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