Friday, 22 April 2016

पुस्तक

कितनी  प्रज्ञा   भरी   तेरी  प्यास  में !
मैं जी रहा हुँ; तुझे पढ़ने की  आश में !

अज्ञान   का   अँधेरा   चारों  ओर   है,
तेरे   पन्नों   ने   मचा   रखा   शोर है। 

कथाओं के  मोती  मिलें  तेरे साथ  में,
मैं  जी  रहा हुँ; तुझे पढ़ने की आश में !

छात्रावस्था से  तूने मुझे पास बुलाया,
अकेले  में  जीने  का रास्ता  दिखाया। 

आज भी अँधेरा भागता तेरे प्रकाश में,  
मैं  जी  रहा  हुँ तुझे  पढ़ने की आश में। 

कोई   नाप  शका  है  तेरी  गहराई को ?
मैंने  पा  ली  तेरी  पर्वत सी ऊँचाई को। 

मैं पा गया;अंतर झूम उठा उल्लास में,
मैं  जी रहा हुँ ; तुझे  पढ़ने की आश में !
                       ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त'

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