पुस्तक
कितनी प्रज्ञा भरी तेरी प्यास में !
मैं जी रहा हुँ; तुझे पढ़ने की आश में !
अज्ञान का अँधेरा चारों ओर है,
तेरे पन्नों ने मचा रखा शोर है।
कथाओं के मोती मिलें तेरे साथ में,
मैं जी रहा हुँ; तुझे पढ़ने की आश में !
छात्रावस्था से तूने मुझे पास बुलाया,
अकेले में जीने का रास्ता दिखाया।
आज भी अँधेरा भागता तेरे प्रकाश में,
मैं जी रहा हुँ तुझे पढ़ने की आश में।
कोई नाप शका है तेरी गहराई को ?
मैंने पा ली तेरी पर्वत सी ऊँचाई को।
मैं पा गया;अंतर झूम उठा उल्लास में,
मैं जी रहा हुँ ; तुझे पढ़ने की आश में !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त'
कितनी प्रज्ञा भरी तेरी प्यास में !
मैं जी रहा हुँ; तुझे पढ़ने की आश में !
अज्ञान का अँधेरा चारों ओर है,
तेरे पन्नों ने मचा रखा शोर है।
कथाओं के मोती मिलें तेरे साथ में,
मैं जी रहा हुँ; तुझे पढ़ने की आश में !
छात्रावस्था से तूने मुझे पास बुलाया,
अकेले में जीने का रास्ता दिखाया।
आज भी अँधेरा भागता तेरे प्रकाश में,
मैं जी रहा हुँ तुझे पढ़ने की आश में।
कोई नाप शका है तेरी गहराई को ?
मैंने पा ली तेरी पर्वत सी ऊँचाई को।
मैं पा गया;अंतर झूम उठा उल्लास में,
मैं जी रहा हुँ ; तुझे पढ़ने की आश में !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त'
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