Tuesday, 26 April 2016

नव प्रभात !

मैं   खड़ा   हुँ  नव प्रभात  के  अरुणोदय सा,
आगे  बढूँगा  जल  प्रपात  के वरुणोदय  सा। 

अंधकार  की टूटी हैं जंजीरें झन झंकार कर,
नया गीत है, नई आवाज़ें, वीणा-टंकार  कर। 

कमर कसे,केशरिया पहने मैं मरणोदय  सा,
आज पड़ा  हुँ  डयोढ़ी  पर मैं  चरणोंदय  सा। 

आसमान   में   चमक  रहे  हैं    चाँद-सितारे,
लज्ज़ित  हैं  उनके प्रकाश  में  महल-मिनारे। 

नक्षत्रों  को देख-देख ;लगता  हिरणोंदय सा।   
आगे  बढूँगा   जल  प्रपात  के वरुणोदय  सा। 
                            ***
-'कान्त'






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