नव प्रभात !
मैं खड़ा हुँ नव प्रभात के अरुणोदय सा,
आगे बढूँगा जल प्रपात के वरुणोदय सा।
अंधकार की टूटी हैं जंजीरें झन झंकार कर,
नया गीत है, नई आवाज़ें, वीणा-टंकार कर।
कमर कसे,केशरिया पहने मैं मरणोदय सा,
आज पड़ा हुँ डयोढ़ी पर मैं चरणोंदय सा।
आसमान में चमक रहे हैं चाँद-सितारे,
लज्ज़ित हैं उनके प्रकाश में महल-मिनारे।
नक्षत्रों को देख-देख ;लगता हिरणोंदय सा।
आगे बढूँगा जल प्रपात के वरुणोदय सा।
***
-'कान्त'
मैं खड़ा हुँ नव प्रभात के अरुणोदय सा,
आगे बढूँगा जल प्रपात के वरुणोदय सा।
अंधकार की टूटी हैं जंजीरें झन झंकार कर,
नया गीत है, नई आवाज़ें, वीणा-टंकार कर।
कमर कसे,केशरिया पहने मैं मरणोदय सा,
आज पड़ा हुँ डयोढ़ी पर मैं चरणोंदय सा।
आसमान में चमक रहे हैं चाँद-सितारे,
लज्ज़ित हैं उनके प्रकाश में महल-मिनारे।
नक्षत्रों को देख-देख ;लगता हिरणोंदय सा।
आगे बढूँगा जल प्रपात के वरुणोदय सा।
***
-'कान्त'
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