Monday, 25 April 2016

प्रपात 

लो उतर पड़ा मैं  घाटी में कूदकर,
कब मिलने तुम आओगे ?
हुँ प्रपात मैं ,कब मुँह दिखलाओगे ?
देख रहा मैं प्रातः की किरणें,फ़ैल रहा उजियारा,
मेरा क्या  है जग में ? सब कुछ है तुम्हारा। 
प्रेम के पावन गीतों में झूमकर ,
कब दर्शन दे जाओगे ?
हुँ प्रपात  मैं,कब मुँह दिखलाओगे ?
निसर्ग खड़ा है आँख मूंदकर,करता है मनमानी,
उसकी चौसठ कलाओंको किसने हैं पहचानी ?
खुद  के मनभावन द्रश्यों में डूबकर,
कब चित्रित हो जाओगे ?
हुँ प्रपात मैं ,कब मुँह दिखलाओगे ?
मैंने पर्वत पार किये,लांघी विशाल नदियाँ ,
अहं भाव आ ना जाये,तुम्ही तो हो खेवैया। 
हुंकार की हल्दी घाटी  से,
क्या तुम मुझे बचाओगे ?
हुँ प्रपात मैं ,कब मुँह दिखलाओगे ?
                       ***
-'कान्त' 




No comments:

Post a Comment