प्रपात
लो उतर पड़ा मैं घाटी में कूदकर,
कब मिलने तुम आओगे ?
हुँ प्रपात मैं ,कब मुँह दिखलाओगे ?
देख रहा मैं प्रातः की किरणें,फ़ैल रहा उजियारा,
मेरा क्या है जग में ? सब कुछ है तुम्हारा।
प्रेम के पावन गीतों में झूमकर ,
कब दर्शन दे जाओगे ?
हुँ प्रपात मैं,कब मुँह दिखलाओगे ?
निसर्ग खड़ा है आँख मूंदकर,करता है मनमानी,
उसकी चौसठ कलाओंको किसने हैं पहचानी ?
खुद के मनभावन द्रश्यों में डूबकर,
कब चित्रित हो जाओगे ?
हुँ प्रपात मैं ,कब मुँह दिखलाओगे ?
मैंने पर्वत पार किये,लांघी विशाल नदियाँ ,
अहं भाव आ ना जाये,तुम्ही तो हो खेवैया।
हुंकार की हल्दी घाटी से,
क्या तुम मुझे बचाओगे ?
हुँ प्रपात मैं ,कब मुँह दिखलाओगे ?
***
-'कान्त'
लो उतर पड़ा मैं घाटी में कूदकर,
कब मिलने तुम आओगे ?
हुँ प्रपात मैं ,कब मुँह दिखलाओगे ?
देख रहा मैं प्रातः की किरणें,फ़ैल रहा उजियारा,
मेरा क्या है जग में ? सब कुछ है तुम्हारा।
प्रेम के पावन गीतों में झूमकर ,
कब दर्शन दे जाओगे ?
हुँ प्रपात मैं,कब मुँह दिखलाओगे ?
निसर्ग खड़ा है आँख मूंदकर,करता है मनमानी,
उसकी चौसठ कलाओंको किसने हैं पहचानी ?
खुद के मनभावन द्रश्यों में डूबकर,
कब चित्रित हो जाओगे ?
हुँ प्रपात मैं ,कब मुँह दिखलाओगे ?
मैंने पर्वत पार किये,लांघी विशाल नदियाँ ,
अहं भाव आ ना जाये,तुम्ही तो हो खेवैया।
हुंकार की हल्दी घाटी से,
क्या तुम मुझे बचाओगे ?
हुँ प्रपात मैं ,कब मुँह दिखलाओगे ?
***
-'कान्त'
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