ग़ज़ल
सिरहाने हमारे ज़रा सज के बैठो,
सिरहाज कई दिनों से मचल रहा है।
गनीमत है हमें तेरे इस इजहार से,
हमनवाओं में सब कुछ बदल रहा है।
मायूस न हो ,दुनिया के इस रवैए से,
सदियों से ये,इश्क को कुचल रहा है।
दिलेपूर आरजू ,लयला की किस्मत में,
असीरों से शैतान नफ़रत उगल रहा है।
जामे ऐश पी ले ,इस भरी अंजुमन में,
'कान्त ' बन्देगम को निगल रहा है।
***
-'कान्त '
सिरहाने हमारे ज़रा सज के बैठो,
सिरहाज कई दिनों से मचल रहा है।
गनीमत है हमें तेरे इस इजहार से,
हमनवाओं में सब कुछ बदल रहा है।
मायूस न हो ,दुनिया के इस रवैए से,
सदियों से ये,इश्क को कुचल रहा है।
दिलेपूर आरजू ,लयला की किस्मत में,
असीरों से शैतान नफ़रत उगल रहा है।
जामे ऐश पी ले ,इस भरी अंजुमन में,
'कान्त ' बन्देगम को निगल रहा है।
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-'कान्त '
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