ग़ज़ल
आँख के आँसू भी बोलते हैं ,
हृदय का द्वार वही खोलते हैं।
ग़ज़ल सोती है दर्द के किनारे,
बिछड़े हुए, खुद को खोजते हैं।
कहीँ मेरा मौन टूट ना जाए,
जो साथ दें ,वो क्यों तोलते हैं ?
दर्द मेरा आग का शोला बने,
चाहनेवाले ही,टीस में झोंकते हैं।
ज्योति में डूब जाते हैं सितारे,
अरमान अँधेरो में डोलते हैं।
***
-'कान्त'
आँख के आँसू भी बोलते हैं ,
हृदय का द्वार वही खोलते हैं।
ग़ज़ल सोती है दर्द के किनारे,
बिछड़े हुए, खुद को खोजते हैं।
कहीँ मेरा मौन टूट ना जाए,
जो साथ दें ,वो क्यों तोलते हैं ?
दर्द मेरा आग का शोला बने,
चाहनेवाले ही,टीस में झोंकते हैं।
ज्योति में डूब जाते हैं सितारे,
अरमान अँधेरो में डोलते हैं।
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-'कान्त'
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