ग़ज़ल
काश तू बेनकाब आ जाता,
आँखों में शबाब आ जाता।
रवानगी मेरी कैसी लगी ?
तेरे चेहरे पे जवाब आ जाता।
तुम पुकार लेते सिर्फ मुझे,
नाचीज़ में रोआब आ जाता।
नफ़ासत है ,नवाज़िश रब की,
हुश्न का सैलाब आ जाता।
चांद की चांदनी अनछुई लगे,
महताब में, शराब आ जाता।
रस्में निभा रहा हूँ सभी मैं ,
हड्डी में ,कबाब आ जाता।
ज़िंदगी खेल है शतरंज का,
जिताने नवाब आ जाता।
***
-'कान्त'
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