Saturday, 18 April 2015

गीत !

अधर पर  धर मुस्कान ,
गाउँ  प्रभु मैं  तेरे गुनगान !
तेरी  करुण  आँखें  अति सुंदर,
देखीं  मैंने अपने अंदर !
तन -मन सब कुछ निछावर कर दूं ,
अपनी गोदी में ले लो भगवान !
बजते हैं नूपुर मेरे उर में ,
ना जानूं ये कैसी हलचल सुर में !
सखी भाव,सब कर्म सब पद धर ,
बनाउँगा मेरी पहचान !
जब तुम आओगे मेरे मन के घाट,
तुम्हें  बिठाऊंगा  टूटी-फूटी खाट !
हृदय गला दो,जीवन धो दो ,
मैं न भूलूँगा ये अहसान !
गूंजेगी मेरे स्वर में गुरुबानी ,
अब न करूंगा मैं अपनी मनमानी !
मेरी मन-वल्लरी खिल जायेगी,
जाग उठेगा तब मेरा स्वाभिमान !
मनमीत,प्राणप्रिय मेरे प्यारे,
'कान्त ' खड़ा है अपने द्वारे !
तेरे चरण कमल में कर शीश याग ,
हो जाउँ मैं तुझ पर कुरबान !
                 ***
-'कान्त'


                   

    







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