गीत !
अधर पर धर मुस्कान ,
गाउँ प्रभु मैं तेरे गुनगान !
तेरी करुण आँखें अति सुंदर,
देखीं मैंने अपने अंदर !
तन -मन सब कुछ निछावर कर दूं ,
अपनी गोदी में ले लो भगवान !
बजते हैं नूपुर मेरे उर में ,
ना जानूं ये कैसी हलचल सुर में !
सखी भाव,सब कर्म सब पद धर ,
बनाउँगा मेरी पहचान !
जब तुम आओगे मेरे मन के घाट,
तुम्हें बिठाऊंगा टूटी-फूटी खाट !
हृदय गला दो,जीवन धो दो ,
मैं न भूलूँगा ये अहसान !
गूंजेगी मेरे स्वर में गुरुबानी ,
अब न करूंगा मैं अपनी मनमानी !
मेरी मन-वल्लरी खिल जायेगी,
जाग उठेगा तब मेरा स्वाभिमान !
मनमीत,प्राणप्रिय मेरे प्यारे,
'कान्त ' खड़ा है अपने द्वारे !
तेरे चरण कमल में कर शीश याग ,
हो जाउँ मैं तुझ पर कुरबान !
***
-'कान्त'
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