गीत !
उतरे चैत
लगे बैसाख दिन
आये हैं मौसम आम पकने के।
अमराई में
सुध-बुध गँवाकर
ज़ायका परखने के।
कोयल स्वर प्रतिबिंब प्यार के।
हर लम्हों से बँधी धार के।
उमर निषेधों की नहीं
अमृत फल
आये हैं मौसम चखने के।
चोंच मार उड़ता है तोता,
सब कुछ पाता कुछ नहीं खोता।
नहीं नकार शकीं
ये डालियाँ
किये प्रयास व्यर्थ ढ़कने के।
मुन्नी,बबलू,ननद ,भोजाई,
मिल जुल कर सास-बहू आईं।
शिकमी हों या
प्रकट हुई क्षण,
आये हैं दिन घूँघट हटने के।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
उतरे चैत
लगे बैसाख दिन
आये हैं मौसम आम पकने के।
अमराई में
सुध-बुध गँवाकर
ज़ायका परखने के।
कोयल स्वर प्रतिबिंब प्यार के।
हर लम्हों से बँधी धार के।
उमर निषेधों की नहीं
अमृत फल
आये हैं मौसम चखने के।
चोंच मार उड़ता है तोता,
सब कुछ पाता कुछ नहीं खोता।
नहीं नकार शकीं
ये डालियाँ
किये प्रयास व्यर्थ ढ़कने के।
मुन्नी,बबलू,ननद ,भोजाई,
मिल जुल कर सास-बहू आईं।
शिकमी हों या
प्रकट हुई क्षण,
आये हैं दिन घूँघट हटने के।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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