पृथ्वी।
मैं पृथ्वी हूँ।
धरा,वसुंधरा,धारिणी ,
जग उद्धारिणी।
दिमाग रख ठंडा और सोच ,
तुम भी कभी खेले थे
बचपन में मेरे साथ गिल्ली-डंडा !
आज़ कहाँ से सीखे ये नया 'फंडा'?
मैंने तुझे झुलाया अपनी बाँहोंमे ,
चलना सिखलाया तुमको राहोंमे।
आज मेरे हाथ-पैर वृक्षों को
तुम काट रहे हो ,
अपना जीवन टुकड़ों में तुम बाँट
रहे हो !
कैसे आएगी हरियाली ???
यूँ तो हर रात रहेगी काली !
तेरे बच्चों को कैसे मिलेगी
खुशियाली???
जंगल मेरा जीवन है,
ये ही मेरा मधुबन है !
पेड़ कदंब के ऊपर चढ़कर तू भी,
बंसरी बजाले ,सात सुरों को सजा ले !
कट रहे पेड़ों को तू बचा ले !
नया मौसम आएगा ,नया सबेरा लाएगा,
रिमझिम बरसेगा सावन
बादल गायेंगे गीत मनभावन !
तेरा बचपन फिर से खेलेगा
मेरे साथ आँख मिचोली
भर दूंगी में खुशियों से तेरी झोली !
तेरी माँ हुँ पगले आज मेरे गले लग ले,
परबत से बहते झरनों की कलकल
तू सुन ले !
***
-'कान्त '
(विश्व पृथ्वी दिन के उपलक्ष में)
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