Tuesday, 21 April 2015

पृथ्वी। 

मैं  पृथ्वी  हूँ। 
धरा,वसुंधरा,धारिणी ,
जग उद्धारिणी। 
दिमाग रख ठंडा और सोच ,
तुम भी कभी खेले थे 
बचपन में मेरे साथ गिल्ली-डंडा !
आज़ कहाँ से सीखे ये नया 'फंडा'?
मैंने तुझे झुलाया अपनी बाँहोंमे ,
चलना सिखलाया तुमको  राहोंमे। 
आज मेरे हाथ-पैर वृक्षों को
तुम काट रहे हो ,
अपना जीवन टुकड़ों में तुम बाँट 
रहे हो !
कैसे आएगी हरियाली ???
यूँ  तो हर रात रहेगी काली !
तेरे बच्चों को कैसे मिलेगी 
खुशियाली???
जंगल मेरा जीवन है,
ये ही मेरा मधुबन  है !
पेड़ कदंब के ऊपर चढ़कर तू भी,
बंसरी बजाले ,सात सुरों को सजा ले !
कट रहे पेड़ों को तू बचा ले !
नया मौसम आएगा ,नया सबेरा लाएगा,
रिमझिम बरसेगा सावन 
बादल गायेंगे गीत मनभावन !
तेरा बचपन फिर से खेलेगा 
मेरे साथ आँख मिचोली 
भर दूंगी में खुशियों से तेरी झोली !
तेरी माँ हुँ पगले आज मेरे गले लग ले,
परबत से बहते झरनों की कलकल 
 तू सुन ले !
                    ***
-'कान्त '
(विश्व पृथ्वी दिन के उपलक्ष में)



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