Tuesday, 14 July 2015

ग़ज़ल 

इक   दिया   अँधेरे  में  जलाये   रखा ,
साकी  बनकर  खुदको  पिलाये  रखा !

तुमने तो  पीछे  मुड़कर  देखा ही नहीं ,
अपना  आँगन   हमने  सजाये   रखा !

नाज़  है ,  दिल  से  चाहने वालों  पर,
हमनवाओं को  अक्सर मिलाये रखा !

औरों ने न की ज़फ़ा ,ज़फ़ा तुमसे हुई ,
प्यार को  हमने  गले  से लगाये रखा !

गनीमत है कि हमारी कीमत तो लगी,
बिक बिक कर अपने को लुटाये  रखा !

आज इक बदली बरसकर नहला गई,
हमने   तो   मौसम को  भगाये  रखा !

जवानी  से बुढ़ापे  तक चाहा बेपनाह,
उलझन, घुटन,हरास को डराये  रखा !
                       ***
-'कान्त'
                                   

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