ग़ज़ल
इक दिया अँधेरे में जलाये रखा ,
साकी बनकर खुदको पिलाये रखा !
तुमने तो पीछे मुड़कर देखा ही नहीं ,
अपना आँगन हमने सजाये रखा !
नाज़ है , दिल से चाहने वालों पर,
हमनवाओं को अक्सर मिलाये रखा !
औरों ने न की ज़फ़ा ,ज़फ़ा तुमसे हुई ,
प्यार को हमने गले से लगाये रखा !
गनीमत है कि हमारी कीमत तो लगी,
बिक बिक कर अपने को लुटाये रखा !
आज इक बदली बरसकर नहला गई,
हमने तो मौसम को भगाये रखा !
जवानी से बुढ़ापे तक चाहा बेपनाह,
उलझन, घुटन,हरास को डराये रखा !
***
-'कान्त'
No comments:
Post a Comment