Saturday, 4 August 2018

ग़ज़ल 

आई  है  तो क्या  यहीं  आकर  पसर  जाएगी  रात ,
राह  चलती  इक मुसाफिर  है, गुजर  जाएगी  रात. 

परवरदिगार    जानता    है     दो   दिलों   के  हाल,
तमाम    आरज़ूओं    पर  असर   कर  जाएगी रात. 

आंसुओं  की  भीख   माँगते   कहाँ -कहाँ  भटकोगे ?
तुम्हारा   लटका हुआ चेहरा  देख ,डर जाएगी रात। 

ठीक है जवानी  में  अक्सर हो जाती हैं  नादानियाँ,
सितारों    से भरे आसमान में , उतर  जाएगी रात.

लहूलुहान  हो गया  है , चारों  और  का   ये अँधेरा,
'कान्त ' की    आँखों     में     ठहर    जाएगी  रात. 
                               ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '


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