ग़ज़ल
ज़िंदगी जब भी तेरी बाँहों में लाती है हमें ,
ये हसीं वादियाँ ढूँढ़ने चली आती हैं हमें !
खिलते फ़ूलों सी महकती हैं ये निग़ाहें ,
शाम ढ़लते ही तेरी आहट सताती है हमें !
प्यार तेरा कभी शबनम तो कभी बूँदाबाँदी ,
न जाने कितनी बार ये रूलातीं है हमें !
दिलेपूर आरज़ू से अक्सर हमने चाहा तुम्हें ,
कैदे हयात भी यही बात समझाती है हमें !
हर मुहब्बत का अंजाम ऐसा क्यों होता है ?
अपने सिरहाज पर ये क्युँ लुटाती है हमें ?
***
-'कान्त'
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