Monday, 8 June 2015

ग़ज़ल 

दिल  तोड़ना  न  था, तोड़ना   पड़ा,
रिश्ता  जोड़ना  न था  जोड़ना पड़ा !

तुम नज़र आये एक-एक लब्ज़  में,
कुछ  बोलना  न था , बोलना   पड़ा !

कितने छिपाये  राज़  अपने  भीतर,
खुद को खोलना न था खोलना पड़ा !

थीं अभी तक जो कुँआरी   चिट्ठियाँ ,
देने    दौड़ना   न  था, दौड़ना   पड़ा !

तेरे  होठों  में   दबी  आवाज़  हुँ  मैं ,
अंजुमन छोड़ना न था,छोड़ना पड़ा !
                      ***
-'कान्त'

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