ग़ज़ल
दिल तोड़ना न था, तोड़ना पड़ा,
रिश्ता जोड़ना न था जोड़ना पड़ा !
तुम नज़र आये एक-एक लब्ज़ में,
कुछ बोलना न था , बोलना पड़ा !
कितने छिपाये राज़ अपने भीतर,
खुद को खोलना न था खोलना पड़ा !
थीं अभी तक जो कुँआरी चिट्ठियाँ ,
देने दौड़ना न था, दौड़ना पड़ा !
तेरे होठों में दबी आवाज़ हुँ मैं ,
अंजुमन छोड़ना न था,छोड़ना पड़ा !
***
-'कान्त'
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